Chhidra
उड़-उड़ कुछ-कुछ तिनके लाती
जुट-जुट लग-लग गाँठ लगाती
बया को अपना घोंसला बनाना है!
आज हर जोड़ पे, मोड़ पे, मेहनत
कल वायु ना वर्षा की वहशत
इस वृक्ष पे सकल जीवन बिताना है!
जमा-जमा इक-इक पाट सजाता
कील-कील कोने-कोने ठोकता जाता
माँझी आज हुआ दीवाना है!
छिद्र कहीं कोई रह ना जाये
एक बूंद ना अंदर आने पाये,
कश्ती को बहुत दूर जाना है!
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वहशत = horror, सकल = whole, पाट = plank, माँझी = boatman, छिद्र = hole, कश्ती = boat
Nice. Especially the second stanza. Nice imagery.
And I just saw that you finished your Ph.D!! Congrats and all the best for the future.
Thanks Adi – I graduated last month. Hope you are doing well – still in Mumbai?