Dor
क्या बनाऊँ बातें उन्हें मनाने को
जब वो रूठते हैं बात बनाने से
ज़िद उनकी कि हर बात दिल की कह दूँ
धूल क्या मिटेगी धरती की झड़ाने से
खींच कर ना देखो मज़बूती डोर की
कमज़ोर ही तो होगी गाँठ लगाने से
जवाबों से अंत नहीं होता सवालों का
अंधेरा कितना कम होगा शमा जलाने से
पर कुछ है भरोसा उनमें ऐसा कि
रात जाती है हर बार सूरज के आने से
yaar mujhe pyar ho gaya hia teri kavitao se..
Very true and beautifully written- brilliant analogies.