Yaadein
लौटा दो मेरा अकेलापन
साथ हो नहीं सकते फिर
क्यों पास रहते हो
दिन में मेरी, बातों में
रात में मेरी, नींदों में
सवेरा हो तो, आईने में
साँझ आये, मेरे , गीतों में
क्यों हटती नहीं हैं
यादें तुम्हारी
जितना दूर जाता हूँ मैं
ये उतनी ही बढ़ती जाती हैं
हर एक कदम के साथ
गीली रेत पर बनते हुए
पद-चिन्हों की तरह
मिटा सकती थीं इन्हें
प्यार की नम लहरें जो
अब पहुँच नहीं पातीं
बीच में दीवार है कोई
बहती हैं सिर्फ़
वक्त की खुश्क हवायें
जो और पक्का कर जाती हैं
ab kya kahen! kuch comment likhna chahta hoon, but I am not able to find words that can describe! mazaa aa gaya padhke
aaj phir isse padhne ki ichcha hui- jo aakhri teen panktiyon mein comparison kiya hai woh bahut hi sundar hai. lagta hai bahut dinon tak mein baar baar yahan aakar isse padhta rahoonga!
after reading those poems,i am speechless.I was feeling each n every word of ur poem.Awesome
am simply impressed!