bhasadalaya

Baatein

Posted in Uncategorized by Nitin Gupta on December 25, 2006

बहुत कुछ कहना है तुमसे
नहीं जानता क्या
पर जानता हूँ
बहुत कुछ कहना है
एक मौका देती है
हर मुलाकात तुम्हारी
पर शब्द नहीं मिलते
शब्द मिलते हैं तो
जुड़ नहीं पाते
जुड़ने की कोशिश में
फ़िर बिखर जाते
मानो कोई महल हो
ताश के पत्तों का
एक पत्ता गलत लग गया
तो सारे गिर जाते हैं
फिर सोचता हूँ नया नक्शा
और एक महल बनाता हूँ
वो भी गिर जाता
या शायद मैं गिराता हूँ
बन ना सका महल तो
पर इस जुस्तज़ू में
नक्शे भरना सीख गया हूँ
कह ना सका
तुमसे दो लव्ज़ भी
पर दिन भर बातें
खुद से करना सीख गया हूँ

One Response

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  1. Ankit said, on December 25, 2006 at 10:27 pm

    bahut sundarta se chaap diya hai tumne… tuk-saamya ka sundar mel hai… badhiyan


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