Bhoomiputra
भूमिपुत्र
(In response to Janmbhoomi)
जब तूने मुझसे जन्म लिया
मैं फूली ना समायी थी
तेरी हँसी किलकारी में
मस्ती रास की छायी थी
तेरी विशाल भुजाओं में ही
मेरे पर्वत की परछायी थी
तेरा नाम जब लिया किसी ने
मैं मोर सी इतरायी थी
जब जब टपके तेरे अश्रु
मुझसे है सौंधी महक उठी
एक बार तो कहता माँ
खेल खेल में मित्रों के संग
चोट हँसकर तूने खायी थी
बचपन के उस हँसी मज़ाक में
छुपी रिश्तों की गहरायी थी
बड़े हुए पर बड़प्पन खोया
निज स्वार्थ हेतु की लड़ायी थी
भूल बैठे वो जीवन की क ख
मेरी प्रकृति ने सिखलायी थी
अपने पुत्रों के इस संग्राम में
मैं पराजित शव सी दहक उठी
एक बार तो कहता माँ
हताश ना हो ऐ मेरे लाल
न किस जीवन में कठनायी थी
आशा की अंगीठी बुझा नहीं
एक बार जो तूने जलायी थी
बढ़ चल आगे, दौड़ा था तू
पर पहले ठोकर खायी थी
और लौट के आ दामन में मेरे
जहाँ पहली ली अंगड़ायी थी
तु रूठ के चुप चाप चला गया
मैं ममता वश हुई बहक उठी
एक बार तो कहता माँ
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